रुद्राक्ष (Rudraksha) की उत्पत्ति: भगवान शिव के अश्रुओं से मानवता को मिला दिव्य वरदान
रुद्राक्ष केवल एक वृक्ष का फल नहीं है, बल्कि यह साक्षात् भगवान शिव की करुणा और उनकी असीम शक्ति का प्रतीक है। शास्त्रों में रुद्राक्ष को ‘देवमणि’ कहा गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस धरती पर रुद्राक्ष का प्राकट्य कैसे हुआ?
शिव पुराण और श्रीमद्देवीभागवत के अनुसार, रुद्राक्ष की उत्पत्ति के पीछे एक अत्यंत दिव्य प्रसंग है, जो देवर्षि नारद और भगवान नारायण के बीच संवाद के रूप में वर्णित है।
नारद-नारायण संवाद: रहस्य की जिज्ञासा
नारद उवाच:
एवंभूतानुभावोऽयं रुद्राक्षो भवताऽनघ। वर्णितो महतां पूज्यः कारणं तत्र किं वद॥
भावार्थ: देवर्षि नारद ने भगवान नारायण से पूछा— “हे निष्पाप नारायण! आपने रुद्राक्ष के जिस अद्भुत प्रभाव का वर्णन किया है, उसके पीछे का कारण क्या है? यह महान पुरुषों द्वारा इतना पूजनीय क्यों है? कृपया इसकी उत्पत्ति की कथा कहें।”
नारायण उवाच: भगवान नारायण ने उत्तर दिया कि यही प्रश्न कार्तिकेय (षण्मुख) ने महादेव से पूछा था। तब महादेव ने जो उत्तर दिया, वही रुद्राक्ष का परम रहस्य है।
भगवान शिव द्वारा वर्णित उत्पत्ति कथा (त्रिपुर वध प्रसंग)
भगवान शिव ने कार्तिकेय को बताया कि प्राचीन काल में ‘त्रिपुर’ नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली और दुर्जय दैत्य था। उसने अपनी शक्ति के मद में ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र सहित समस्त देवताओं को पराजित कर दिया था। जब त्रस्त देवताओं ने महादेव की शरण ली, तब भगवान शिव ने लोक कल्याण के लिए एक कठोर निर्णय लिया।
ईश्वर उवाच (भगवान शिव के शब्द):
त्रिपुरस्य वधार्थाय देवानां तारणाय च। सर्वविघ्नोपशमनमघोरास्त्रमचिन्तयम्॥
भावार्थ: शिव जी बोले— “हे षण्मुख! देवताओं की रक्षा, त्रिपुर के वध और सृष्टि के विघ्नों को शांत करने के लिए मैंने ‘अघोर’ नामक एक अत्यंत दिव्य और ज्वलंत महाशस्त्र का चिंतन किया।”
दिव्य सहस्र वर्ष का ध्यान और अश्रुपात
भगवान शिव उस अघोर अस्त्र की सिद्धि के लिए गहन ध्यान में लीन हो गए। उन्होंने बिना पलक झपकाए दिव्य एक हजार वर्षों तक अपने नेत्र खुले रखे।
दिव्यवर्षसहस्रं तु चक्षुरुन्मीलितं मया। पश्चादाकुलिताक्षिभ्यः पतिता जलबिन्दवः॥
भावार्थ: महादेव कहते हैं— “हजार वर्षों तक बिना पलक झपकाए ध्यान करने के कारण मेरे नेत्र व्याकुल हो उठे और उनसे जल की कुछ बूंदें (अश्रु) पृथ्वी पर गिरीं।”
रुद्राक्ष वृक्षों का प्राकट्य
भगवान शिव के उन दिव्य अश्रु बिंदुओं से ही महारुद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए। महादेव ने स्वयं कहा है:
तत्राश्रुबिन्दतो जाता महारुद्राक्षवृक्षकाः। ममाज्ञया महासेन सर्वेषां हितकाम्यया॥
अर्थात: “हे महासेन (कार्तिकेय)! मेरी आज्ञा से और समस्त प्राणियों के हित की कामना से, उन अश्रु बिंदुओं से रुद्राक्ष के वृक्ष पैदा हुए।”

रुद्राक्ष (Rudraksha) : महादेव का वह अश्रु, जो बना मानवता का सुरक्षा कवच
रुद्राक्ष केवल एक बीज नहीं, बल्कि साक्षात् भगवान शिव का आशीर्वाद है। जब जीवन की समस्याएं मनुष्य को घेर लेती हैं और कोई मार्ग नहीं सूझता, तब शिव का यह वरदान एक आध्यात्मिक प्रकाश स्तंभ की तरह कार्य करता है।
शब्द का अर्थ: रुद्र और अक्ष
हिंदू धर्म में ‘रुद्राक्ष’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है:
- रुद्र: भगवान शिव का प्रचंड और शक्तिशाली स्वरूप।
- अक्ष: नेत्र या आँसू की बूँदें। अर्थात्, वह दिव्य मणि जो शिव के नेत्रों से प्रकट हुई।
पौराणिक कथा: करुणा से उपजी उत्पत्ति
शिव पुराण के अनुसार, एक समय भगवान शिव संपूर्ण मानवता के दुखों को दूर करने और सभी जीवों के कल्याण के लिए गहन ध्यान (समाधि) में लीन हो गए। हज़ारों वर्षों के ध्यान के बाद, जब महादेव ने अपने नेत्र खोले, तो संसार के प्रति उनकी अगाध करुणा के कारण उनकी आँखों से अश्रु छलक पड़े।
पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ शिव के ये आँसू गिरे, वहाँ-वहाँ रुद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए। इसीलिए इसे साक्षात् शिव का रूप माना जाता है।
धार्मिक महत्व और सुरक्षा
आपने शिव की हर प्रतिमा या तस्वीर में देखा होगा कि वे रुद्राक्ष धारण करते हैं। भक्त इसे केवल एक आभूषण नहीं, बल्कि एक रक्षा कवच के रूप में पहनते हैं:
- निडर जीवन: यह धारण करने वाले को अकाल मृत्यु के भय और नकारात्मक शक्तियों से बचाता है।
- ब्रह्मांड का रहस्य: कई साधक मानते हैं कि रुद्राक्ष की धारियों (मुखों) में ब्रह्मांड के विकास का रहस्य छिपा है।
- शांति और स्वास्थ्य: यह मन को शांत रखने और शारीरिक व्याधियों को दूर करने में सहायक है।
रुद्राक्ष का विज्ञान (Botanical Insight)
आध्यात्मिकता के साथ-साथ विज्ञान भी रुद्राक्ष की विलक्षणता को स्वीकार करता है:
- वैज्ञानिक नाम: एलियोकार्पस गैनिट्रस रॉक्सब (Elaeocarpus Ganitrus Roxb)।
- वृक्ष की प्रकृति: यह टिलियासी परिवार का एक सदाबहार वृक्ष है, जिसकी ऊँचाई 15 से 60 मीटर तक हो सकती है।
- क्षेत्र: ये मुख्य रूप से नेपाल और इंडोनेशिया (जहाँ सबसे अधिक उत्पादन होता है) के अलावा भारत और मलेशिया के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
- विशेषता: एक रुद्राक्ष का वृक्ष रोपण के लगभग 7 वर्ष बाद फल (बीज) देना शुरू करता है।
रुद्राक्ष के चौदह प्रकार के नाम और उनकी महिमा
॥ एकमुखी रुद्राक्ष माहात्म्यम् ॥
शुद्ध संस्कृत श्लोक:
एकवक्त्रः शिवः साक्षाद् भुक्तिमुक्तिफलप्रदः। तस्य दर्शनमात्रेण ब्रह्महत्या व्यपोहति ॥ ६० ॥ (संदर्भ: शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25)
शुद्ध हिंदी अर्थ एवं व्याख्या:
श्लोक ६०: एक मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात भगवान शिव का स्वरूप है। यह ‘भुक्ति’ (संसार के समस्त सुख-भोग) और ‘मुक्ति’ (जन्म-मरण के चक्र से मोक्ष) दोनों प्रदान करने वाला है।
पाप निवारण: इसकी महिमा इतनी अपार है कि इसे धारण करना तो दूर, इसके दर्शन मात्र से ‘ब्रह्महत्या’ जैसे महापाप का प्रभाव भी मिट जाता है।
एक मुखी रुद्राक्ष का विशेष महत्व:
साक्षात शिव: शास्त्रों के अनुसार, जहाँ एक मुखी रुद्राक्ष की पूजा होती है, वहाँ से दरिद्रता और दुख कोसों दूर रहते हैं। यह साक्षात शिव की उपस्थिति का अनुभव कराता है।
सूर्य ग्रह की शांति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, एक मुखी रुद्राक्ष सूर्य (Sun) ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। यह आत्म-सम्मान, नेतृत्व शक्ति और यश प्रदान करता है।
एकाग्रता और ब्रह्म ज्ञान: यह ध्यानियों और योगियों के लिए सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि यह मन को परम तत्व की ओर ले जाता है और इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने में सहायक होता है।
दुर्लभता: प्राकृतिक रूप से “गोल” एक मुखी रुद्राक्ष अत्यंत दुर्लभ है, इसलिए इसे ‘देवमणि’ भी कहा जाता है।
॥ द्विमुखी रुद्राक्ष माहात्म्यम् ॥
शुद्ध संस्कृत श्लोक:
द्विवक्त्रो देवदेवेशो अर्धनारीश्वरो भवेत्। द्विविधं नाशयेदघं धारणात्तस्य सुव्रत ॥ ६१ ॥ (संदर्भ: शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25)
शुद्ध हिंदी अर्थ एवं व्याख्या:
श्लोक ६१: दो मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात अर्धनारीश्वर (शिव और देवी पार्वती का संयुक्त स्वरूप) है। हे सुव्रत! इसे धारण करने से दो प्रकार के पापों (मानसिक और शारीरिक) का नाश होता है।
देव-देवी स्वरूप: इसमें देवता (शिव) और देवी (शक्ति) दोनों का वास है, इसलिए यह पुरुष और प्रकृति के संतुलन का प्रतीक है।
दो मुखी रुद्राक्ष का विशेष महत्व:
अर्धनारीश्वर स्वरूप: यह रुद्राक्ष एकता और सामंजस्य का प्रतीक है। इसे धारण करने से पति-पत्नी, मित्र और पारिवारिक रिश्तों में मधुरता आती है।
चंद्र ग्रह की शांति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, दो मुखी रुद्राक्ष चंद्र (Moon) ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। यह मानसिक तनाव, अनिद्रा और चंचल मन को शांत करने के लिए सर्वोत्तम है।
एकाग्रता और शांति: जो लोग भावनात्मक रूप से अस्थिर रहते हैं या जिन्हें निर्णय लेने में कठिनाई होती है, उनके लिए यह रुद्राक्ष मानसिक बल प्रदान करता है।
पाप निवारण: ‘द्विविधं अघं’ का अर्थ है कि यह ज्ञात और अज्ञात, दोनों प्रकार के पापों के प्रभाव को कम कर व्यक्ति को आंतरिक शुद्धि प्रदान करता है।
॥ त्रिमुखी रुद्राक्ष माहात्म्यम् ॥
शुद्ध संस्कृत श्लोक:
त्रिवक्त्रस्त्वनलः साक्षात्स्त्रीहत्यां दहति क्षणात्। तद्धारणाच्च पावकः तुष्यते नात्र संशयः ॥ ६२ ॥ (संदर्भ: शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25)
शुद्ध हिंदी अर्थ एवं व्याख्या:
श्लोक ६२: तीन मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात ‘अनल’ (अग्नि देव) का स्वरूप है। जिस प्रकार अग्नि सब कुछ भस्म कर देती है, उसी प्रकार इस रुद्राक्ष को धारण करने से स्त्री-हत्या जैसा भयंकर पाप भी क्षण भर में जलकर नष्ट हो जाता है।
अग्नि कृपा: इसे धारण करने से अग्नि देव प्रसन्न होते हैं और धारण करने वाला व्यक्ति तेजस्वी बनता है। इस विषय में कोई संशय नहीं है।
तीन मुखी रुद्राक्ष का विशेष महत्व:
अग्नि स्वरूप: यह रुद्राक्ष व्यक्ति के भीतर के आत्मविश्वास (Confidence) को जाग्रत करता है और आलस्य को दूर करता है। जैसे अग्नि सोने को शुद्ध करती है, वैसे ही यह आत्मा को शुद्ध करता है।
मंगल ग्रह की शांति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, तीन मुखी रुद्राक्ष मंगल (Mars) ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। यह रक्त संबंधी दोषों, भूमि विवादों और क्रोध पर नियंत्रण पाने में सहायक है।
शारीरिक ऊर्जा: इसे धारण करने से पाचन तंत्र सुधरता है और शरीर में स्फूर्ति आती है। यह ‘मणिपुर चक्र’ को जागृत करने में भी सहायक माना जाता है।
पाप निवारण: शास्त्रों में स्त्री-हत्या को महापाप माना गया है। इस रुद्राक्ष की महिमा इतनी है कि यह उस पाप के मानसिक और आध्यात्मिक प्रभाव को भी समाप्त कर देता है।
॥ चतुर्मुखी रुद्राक्ष माहात्म्यम् ॥
शुद्ध संस्कृत श्लोक:
चतुर्वक्त्रः स्वयं ब्रह्मा नरहत्यां व्यपोहति। दर्शनात्स्पर्शनाच्चैव ब्रह्मवर्चसप्रदः सदा ॥ ६३ ॥ (संदर्भ: शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25)
शुद्ध हिंदी अर्थ एवं व्याख्या:
श्लोक ६३: चार मुख वाला रुद्राक्ष स्वयं ब्रह्मा का स्वरूप है। इसे धारण करने से नर-हत्या (मनुष्य की हत्या) जैसे जघन्य पाप का प्रभाव भी दूर हो जाता है।
फल: इस रुद्राक्ष के दर्शन और स्पर्श मात्र से मनुष्य को ‘ब्रह्मवर्चस’ (दिव्य ज्ञान, तेज और आध्यात्मिक शक्ति) प्राप्त होती है।
चार मुखी रुद्राक्ष का विशेष महत्व:
ब्रह्मा स्वरूप: चूंकि ब्रह्मा जी चारों वेदों के ज्ञाता हैं, इसलिए यह रुद्राक्ष धारण करने वाले की बुद्धि, एकाग्रता और तर्क शक्ति को बढ़ाता है।
बुध ग्रह की शांति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चार मुखी रुद्राक्ष बुध (Mercury) ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। यह शिक्षा, व्यापार और संचार (Communication) के क्षेत्र में सफलता दिलाने में सहायक है।
विद्यार्थियों के लिए वरदान: जो छात्र पढ़ाई में कमजोर हैं या जिनकी स्मरण शक्ति कम है, उनके लिए यह रुद्राक्ष अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
पाप निवारण: श्लोक में ‘नरहत्या’ के पाप से मुक्ति का उल्लेख इसकी महान शोधन शक्ति को दर्शाता है, जो आत्मा को भारी से भारी दोषों से मुक्त कर उसे सात्विक बनाती है।
॥ पञ्चमुखी रुद्राक्ष माहात्म्यम् ॥
शुद्ध संस्कृत श्लोक:
पञ्चवक्त्रः स्वयं रुद्रः कालाग्निर्नाम नामतः। अभक्ष्यभक्षणोद्भूतैरगम्यागमनोद्भवैः ॥ ६४ ॥
मुच्यते सर्वपापैस्तु पञ्चवक्त्रस्य धारणात्। पञ्चवक्त्रः स्वयं रुद्रः सर्वकल्याणकारकः ॥ ६५ ॥ (संदर्भ: शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25)
शुद्ध हिंदी अर्थ एवं व्याख्या:
श्लोक ६४-६५: पाँच मुख वाला रुद्राक्ष स्वयं कालाग्नि रुद्र का स्वरूप है। जो मनुष्य अनजाने में या अज्ञानवश अभक्ष्य-भक्षण (जो खाने योग्य न हो उसे खाना) करता है अथवा अगम्यागमन (वर्जित या अनैतिक संबंधों) जैसे महापापों में लिप्त रहा हो, वह भी पाँच मुखी रुद्राक्ष को धारण करने मात्र से इन सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
कल्याणकारी: पाँच मुखी रुद्राक्ष साक्षात शिव का रूप होने के कारण सर्वकल्याणकारक (सभी प्रकार का मंगल करने वाला) है।
पाँच मुखी रुद्राक्ष का विशेष महत्व:
सर्वाधिक सुलभ और शक्तिशाली: यह रुद्राक्ष सबसे अधिक पाया जाता है और इसे धारण करना हर मनुष्य के लिए सरल और फलदायी है।
बृहस्पति (गुरु) ग्रह की शांति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यह बृहस्पति ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। यह ज्ञान, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।
मानसिक शुद्धि: श्लोक में ‘अभक्ष्य-भक्षण’ और ‘अगम्यागमन’ के पापों से मुक्ति की जो बात कही गई है, उसका गहरा अर्थ यह है कि यह रुद्राक्ष व्यक्ति के अंतःकरण और विचारों को शुद्ध करता है, जिससे वह भविष्य में ऐसे पापों से बच सके।
स्वास्थ्य लाभ: इसे धारण करने से रक्तचाप (Blood Pressure) नियंत्रित रहता है और हृदय संबंधी रोगों में लाभ मिलता है।
॥ षष्ठमुखी रुद्राक्ष माहात्म्यम् ॥
शुद्ध संस्कृत श्लोक:
षड्वक्त्रः कार्तिकेयस्तु स धार्यो दक्षिणे भुजे। ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥ ६६ ॥ (संदर्भ: शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25)
शुद्ध हिंदी अर्थ एवं व्याख्या:
श्लोक ६६: छह मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात भगवान कार्तिकेय का स्वरूप है। इसे विशेष रूप से दाहिनी भुजा (दक्षिणे भुजे) पर धारण करना चाहिए। इसे धारण करने वाला मनुष्य ब्रह्महत्या जैसे घोर पापों से भी मुक्त हो जाता है, इस विषय में तनिक भी संशय नहीं करना चाहिए।
छह मुखी रुद्राक्ष का विशेष महत्व:
कार्तिकेय स्वरूप: भगवान कार्तिकेय शक्ति, साहस और विजय के प्रतीक हैं। अतः यह रुद्राक्ष धारण करने वाले को निर्भय बनाता है और उसे शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति देता है।
दाहिनी भुजा का विधान: शास्त्रों में इसे दाईं भुजा (Arm) पर बांधने का निर्देश दिया गया है, क्योंकि दायां भाग पुरुषत्व और कर्म की प्रधानता का प्रतीक है। वर्तमान में लोग इसे गले में भी धारण करते हैं, जो कि पूर्णतः मान्य है।
शुक्र ग्रह की शांति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, छह मुखी रुद्राक्ष शुक्र (Venus) ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। यह वैवाहिक सुख, विलासिता और कलात्मक कार्यों में सफलता प्रदान करता है।
विद्या और बुद्धि: चूंकि कार्तिकेय जी अत्यंत बुद्धिमान और कुशल रणनीतिकार हैं, इसलिए यह रुद्राक्ष छात्रों और उन लोगों के लिए बहुत लाभकारी है जिन्हें एकाग्रता (Concentration) की आवश्यकता होती है।
॥ सप्तमुखी रुद्राक्ष माहात्म्यम् ॥
शुद्ध संस्कृत श्लोक:
सप्तवक्त्रो महाभाग ह्यनङ्गो नाम नामतः। तद्धारणान्मुच्यते हि स्वर्णस्तेयादिपातकैः ॥ ६७ ॥
सप्तवक्त्रो महेशानि ह्यनन्तो नाम नामतः। तद्धारणाद्दरिद्रोऽपि ऐश्वर्यमतुलं लभेत् ॥ ६८ ॥ (संदर्भ: शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25)
शुद्ध हिंदी अर्थ एवं व्याख्या:
श्लोक ६७: (भगवान शिव कहते हैं) हे महाभाग! सात मुख वाला रुद्राक्ष ‘अनंग’ नाम से प्रसिद्ध है। इसे धारण करने से मनुष्य स्वर्ण की चोरी (स्वर्णस्तेय) जैसे बड़े पापों से निश्चित ही मुक्त हो जाता है।
श्लोक ६८: हे महेशानि! सात मुखी रुद्राक्ष को ‘अनन्त’ (शेषनाग) का स्वरूप भी माना जाता है। इसे धारण करने मात्र से दरिद्र (गरीब) व्यक्ति भी अतुल्य ऐश्वर्य और संपत्ति प्राप्त कर लेता है।
सात मुखी रुद्राक्ष का विशेष महत्व:
महालक्ष्मी की कृपा: यद्यपि श्लोक में इसे अनंग और अनन्त कहा गया है, परंतु परंपरा में इसे सात माताओं (सप्तमातृका) और महालक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए यह आर्थिक उन्नति के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
शनि ग्रह की शांति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सात मुखी रुद्राक्ष शनि ग्रह को नियंत्रित करता है। शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के समय इसे धारण करना अत्यंत लाभकारी होता है।
स्वर्ण चोरी का पाप: शास्त्रों में ‘पंच महापाप’ बताए गए हैं, जिनमें स्वर्ण की चोरी एक है। सात मुखी रुद्राक्ष में उस पाप के प्रायश्चित की शक्ति समाहित है।
व्यापार में उन्नति: जो लोग व्यापार या नौकरी में मंदी का सामना कर रहे हैं, उनके लिए यह ‘अनन्त’ ऐश्वर्य देने वाला माना गया है।

॥ अष्टमुखी रुद्राक्ष माहात्म्यम् ॥
शुद्ध संस्कृत श्लोक:
अष्टवक्त्रो महासेन साक्षाद्देवो विनायकः। अन्नकूटं तूलकूटं स्वर्णकूटं तथैव च ॥ ६९ ॥
स्पृशन्वै गुरुतल्पाढ्यां ब्रह्महत्यां च विन्दति। एवमादीनि पापानि हन्ति सर्वाणि धारणात् ॥ ७० ॥
विघ्नास्तस्य प्रणश्यन्ति याति चान्ते परं पदम्। भवन्त्येते गुणाः सर्वे ह्यष्टवक्त्रस्य धारणात् ॥ ७१ ॥ (संदर्भ: शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25)
शुद्ध हिंदी अर्थ एवं व्याख्या:
श्लोक ६९: (भगवान शिव कार्तिकेय से कहते हैं) हे महासेन! आठ मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात विनायक (भगवान गणेश) का स्वरूप है।
श्लोक ६९-७०: अन्नकूट (अन्न की चोरी), तूलकूट (माप-तौल में बेईमानी) और स्वर्णकूट (सोने की चोरी) जैसे पाप, अथवा गुरु-पत्नी के गमन (गुरुतल्पा) या ब्रह्महत्या जैसे भयंकर पाप भी इस रुद्राक्ष को धारण करने मात्र से नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक ७१: इसे धारण करने वाले व्यक्ति के मार्ग में आने वाले सभी विघ्न (बाधाएं) नष्ट हो जाते हैं और वह अंत में ‘परम पद’ (मोक्ष) को प्राप्त करता है। ये सभी दिव्य गुण आठ मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से प्राप्त होते हैं।
आठ मुखी रुद्राक्ष का विशेष महत्व:
विघ्नहर्ता: चूंकि यह गणेश जी का स्वरूप है, इसलिए किसी भी नए कार्य को शुरू करने से पहले या कार्यों में आ रही अड़चनों को दूर करने के लिए इसे धारण करना सर्वोत्तम है।
राहु ग्रह की शांति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, आठ मुखी रुद्राक्ष राहु ग्रह के दुष्प्रभावों को नियंत्रित करता है। यह अचानक आने वाली समस्याओं और भ्रम की स्थिति से बचाता है।
शुद्धि: श्लोक ७० में वर्णित विभिन्न ‘कूट’ (धोखाधड़ी या चोरी) और अनैतिक कृत्यों के पापों का शमन करने की इसकी शक्ति यह दर्शाती है कि यह रुद्राक्ष मनुष्य के अंतःकरण को शुद्ध कर उसे सन्मार्ग पर लाता है।
लेखन और बुद्धि: यह छात्रों, लेखकों और बुद्धिजीवियों के लिए अत्यंत लाभकारी है क्योंकि गणेश जी बुद्धि और विद्या के अधिष्ठाता देव हैं।
॥ नवमुखी रुद्राक्ष माहात्म्यम् ॥
शुद्ध संस्कृत श्लोक:
नववक्त्रो भैरवस्तु धारयेद्वामबाहुके। भुक्तिमुक्तिप्रदः प्रोक्तो मम तुल्यबलो भवेत् ॥ ७१ ॥
भ्रूणहत्यासहस्राणि ब्रह्महत्याशतानि च। सद्यः प्रलयमायान्ति नववक्त्रस्य धारणात् ॥ ७२ ॥ (संदर्भ: शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25)
शुद्ध हिंदी अर्थ एवं व्याख्या:
श्लोक ७१: (भगवान शिव कहते हैं) नौ मुख वाला रुद्राक्ष (Rudraksha) साक्षात भैरव का स्वरूप है। इसे विशेष रूप से बाईं भुजा (वामबाहु) पर धारण करना चाहिए। यह रुद्राक्ष ‘भुक्ति’ (संसार के सुख) और ‘मुक्ति’ (मोक्ष) दोनों प्रदान करने वाला है। इसे धारण करने वाला व्यक्ति मेरे (शिव के) समान बलवान हो जाता है।
श्लोक ७२: हजारों भ्रूणहत्या (गर्भहत्या) और सैकड़ों ब्रह्महत्या जैसे जघन्य और भयंकर पाप भी नौ मुखी रुद्राक्ष को धारण करने मात्र से तत्काल (सद्यः) नष्ट हो जाते हैं।
नौ मुखी रुद्राक्ष का विशेष महत्व:
देवी शक्ति: भैरव स्वरूप होने के साथ-साथ यह नवदुर्गा (माँ दुर्गा) के नौ स्वरूपों का भी प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए यह शक्ति उपासकों के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
बाईं भुजा का रहस्य: शास्त्रों में इसे ‘वामबाहु‘ (Left Arm) पर पहनने का निर्देश दिया गया है। चूंकि बायां भाग शक्ति का प्रतीक है, इसलिए इसे यहाँ धारण करने से आंतरिक शक्ति और साहस का संचार होता है।
निर्भयता: इसे धारण करने वाले को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता और यमराज के भय से मुक्ति मिलती है।
पाप नाशक: श्लोक में ‘भ्रूणहत्या‘ और ‘ब्रह्महत्या‘ के नाश की बात इसकी असीम शोधन शक्ति (Purifying Power) को दर्शाती है, जो आत्मा पर लगे गहरे संस्कारों को भी शुद्ध कर देती है।
॥ दशमुखी रुद्राक्ष माहात्म्यम् ॥
शुद्ध संस्कृत श्लोक:
दशवक्त्रस्तु देवेशि साक्षाद्देवो जनार्दनः। ग्रहाश्चैव पिशाचाश्च वेताला ब्रह्मराक्षसाः ॥ ७३ ॥
पन्नगाश्चोपशाम्यन्ति दशवक्त्रस्य धारणात्। तद्धारणात्तु देवेशि सर्वकामं लभेन्नरः ॥ ७४ ॥ (संदर्भ: शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25)
शुद्ध हिंदी अर्थ एवं व्याख्या:
श्लोक ७३: हे देवेशि (पार्वती)! दस मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात भगवान जनार्दन (विष्णु) का स्वरूप है। इसे धारण करने से क्रूर ग्रह, पिशाच, वेताल और ब्रह्मराक्षस जैसी नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं।
श्लोक ७४: दस मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से पन्नग (सर्प/नाग) का विष या भय शांत हो जाता है। हे देवी! जो मनुष्य इसे धारण करता है, वह अपनी सभी कामनाओं (सर्वकामं) को प्राप्त कर लेता है।
दस मुखी रुद्राक्ष का विशेष महत्व:
विष्णु स्वरूप: भगवान विष्णु के दस अवतारों की शक्ति इसमें समाहित मानी गई है। यह जीवन में स्थिरता और सुरक्षा (Protection) प्रदान करता है।
ग्रह शांति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, दस मुखी रुद्राक्ष (Rudraksha) दसों दिशाओं के दिग्पालों और नौ ग्रहों के अशुभ प्रभाव को शांत करने की शक्ति रखता है। यदि किसी की कुंडली में ग्रह अनुकूल न हों, तो यह सर्वोत्तम कवच है।
तंत्र बाधा निवारण: जैसा कि श्लोक में स्पष्ट है (पिशाच, वेताल, ब्रह्मराक्षस), यह रुद्राक्ष नजर दोष, ऊपरी बाधा और काले जादू जैसी नकारात्मक ऊर्जाओं के विरुद्ध एक अभेद्य सुरक्षा तंत्र बनाता है।
कानूनी बाधाएं: इसे धारण करने से कोर्ट-कचहरी और विवादों में भी विजय की संभावना बढ़ती है क्योंकि यह धारक को मानसिक स्पष्टता और धैर्य देता है।
॥ एकादशमुखी रुद्राक्ष माहात्म्यम् ॥
शुद्ध संस्कृत श्लोक:
वक्त्रेकादशरुद्राक्षो रुद्रेकादशकः स्मृतः। शिखायां धारयेद्यो वै तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ ७५ ॥
अश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयशतस्य च। गवां शतसहस्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम् ॥ ७६ ॥
तत्फलं लभते शीघ्रं वक्त्रेकादशधारणात् ॥ ७७ ॥ (संदर्भ: शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25)
शुद्ध हिंदी अर्थ एवं व्याख्या:
श्लोक ७५: ग्यारह मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात ग्यारह रुद्रों (एकादश रुद्र) का स्वरूप माना गया है। जो मनुष्य इसे अपनी शिखा (मस्तक) में धारण करता है, उसके पुण्य फल का वर्णन सुनो।
श्लोक ७६-७७: एक हजार अश्वमेध यज्ञ करने का फल, सौ वाजपेय यज्ञ करने का फल और एक लाख गौदान (गोदान) विधिपूर्वक करने से जो महान पुण्य फल प्राप्त होता है, वह फल ग्यारह मुखी रुद्राक्ष को धारण करने मात्र से मनुष्य को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है।
ग्यारह मुखी रुद्राक्ष का विशेष महत्व:
हनुमान स्वरूप: तंत्र और पुराणों के अनुसार, यह रुद्राक्ष (Rudraksha) भगवान हनुमान (जो स्वयं ग्यारहवें रुद्र हैं) का स्वरूप है। इसे धारण करने से साहस, आत्मविश्वास और वाक्-शक्ति (बोलने की कला) में वृद्धि होती है।
विजय प्रदायक: जो व्यक्ति राजनीति, न्यायपालिका या किसी भी प्रतिस्पर्धात्मक क्षेत्र में सफलता चाहते हैं, उनके लिए यह सर्वोत्तम है।
शिखा धारण का रहस्य: जैसा कि श्लोक में कहा गया है— ‘शिखायां धारयेद्यो’, इसे मस्तक पर धारण करने से व्यक्ति के विवेक और आध्यात्मिक ऊर्जा का विकास होता है।
योगिक लाभ: यह योगियों के लिए भी अत्यंत फलदायी है क्योंकि यह ध्यान की गहराई में जाने में मदद करता है।
॥ द्वादशमुखी रुद्राक्ष माहात्म्यम् ॥
संस्कृत श्लोक:
द्वादशास्यस्य रुद्राक्षस्यैव कर्णे तु धारणात्। आदित्यास्तोषिता नित्यं द्वादशास्ये व्यवस्थिताः ॥ ७८ ॥
गोमेधे चाश्वमेधे च यत्फलं तदवाप्नुयात्। शृङ्गिणां शस्त्रिणां चैव व्याघ्रादीनां भयं नहि ॥ ७९ ॥
न च व्याधिभयं तस्य नैव चाधिः प्रकीर्तितः। न च किञ्चिद्भयं तस्य न व्याधिः प्रवर्धते ॥ ८० ॥
न कुतश्चिद्भयं तस्य सुखी चैवेश्वरो भवेत्। हस्त्यश्वमृगमार्जारसर्वमूषकदर्दुरान् ॥ ८१ ॥
खरांश्चैव शृगालांश्च हत्वा बहुविधानपि। मुच्यते नात्र सन्देहो वक्त्रद्वादशधारणात् ॥ ८२ ॥ (संदर्भ: शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25)
शुद्ध हिंदी अर्थ:
श्लोक ७८: बारह मुख वाले रुद्राक्ष (Rudraksha) को कान (कर्ण) में धारण करने से बारहों आदित्य (सूर्य देव के 12 स्वरूप) नित्य प्रसन्न रहते हैं, क्योंकि वे इस रुद्राक्ष के बारह मुखों में ही निवास करते हैं।
श्लोक ७९: इसे धारण करने से मनुष्य को गोमेध और अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। उसे सींग वाले पशुओं (शृङ्गिणां), शस्त्रधारियों (शस्त्रिणां) और बाघ (व्याघ्र) आदि हिंसक जीवों का कोई भय नहीं रहता।
श्लोक ८०-८१: उसे न तो शारीरिक रोगों (व्याधि) का भय रहता है और न ही मानसिक कष्टों (आधि) का। उसे कहीं से भी कोई भय नहीं होता और न ही कोई बीमारी उसे बढ़ती (प्रताड़ित करती) है। वह पूर्ण सुखी रहता है और ऐश्वर्यशाली (ईश्वर के समान तेजस्वी) बनता है।
श्लोक ८१-८२: हाथी, घोड़ा, मृग, बिल्ली, चूहा, मेंढक, गधा, कुत्ता और सियार आदि बहुत से जीवों की (अज्ञानवश या परिस्थिति वश) हत्या करने का जो पाप लगता है, वह बारह मुखी रुद्राक्ष धारण करने मात्र से निश्चय ही नष्ट हो जाता है; इसमें कोई संदेह नहीं है।
विशेष टिप्पणी:
शास्त्रों में बारह मुखी रुद्राक्ष (Rudraksha) को साक्षात ‘सूर्य स्वरूप’ माना गया है। इसीलिए इसे धारण करने वाले व्यक्ति का तेज सूर्य के समान बढ़ता है और उसकी प्रशासनिक (Leadership) क्षमता मजबूत होती है।
॥ त्रयोदशमुखी रुद्राक्ष माहात्म्यम् ॥
शुद्ध संस्कृत श्लोक:
वक्त्रत्रयोदशो वत्स रुद्राक्षो यदि लभ्यते। कार्तिकेयसमोज्ञेयः सर्वकामार्थसिद्धिदः ॥ ८३ ॥
रसो रसायनं चैव तस्य सर्वं प्रसिद्ध्यति। तस्यैव सर्वभोग्यानि नात्र कार्या विचारणा ॥ ८४ ॥
मातरं पितरं चैव भ्रातरं वा निहन्ति यः। मुच्यते सर्वपापेभ्यो धारणात्तस्य षण्मुख ॥ ८५ ॥ (संदर्भ: शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25)
शुद्ध हिंदी अर्थ एवं व्याख्या:
श्लोक ८३: (भगवान शिव कहते हैं) हे वत्स! यदि तेरह मुख वाला रुद्राक्ष प्राप्त हो जाए, तो उसे साक्षात भगवान कार्तिकेय के समान समझना चाहिए। यह रुद्राक्ष मनुष्य की समस्त कामनाओं (इच्छाओं) और अर्थ (धन-संपत्ति) को सिद्ध करने वाला है।
श्लोक ८४: इस रुद्राक्ष को धारण करने वाले व्यक्ति के लिए रस और रसायन (आयुर्वेद, औषधि विज्ञान और सिद्धियां) स्वतः ही सिद्ध हो जाते हैं। वह संसार के सभी प्रकार के सुखों और भोगों को प्राप्त करता है। इस विषय में किसी भी प्रकार के संदेह या विचार करने की आवश्यकता नहीं है (अर्थात यह पूर्ण सत्य है)।
श्लोक ८५: हे षण्मुख (कार्तिकेय)! जो मनुष्य (अज्ञानवश या प्रमादवश) माता, पिता अथवा भाई की हत्या जैसे घोर पाप भी कर देता है, वह भी इस तेरह मुखी रुद्राक्ष को धारण करने मात्र से उन समस्त महापापों से मुक्त हो जाता है।
विशेष विवरण (महत्व):
सिद्धिदायक: इसे ‘इंद्र’ और ‘कामदेव’ का भी प्रतीक माना जाता है, जिससे धारक के व्यक्तित्व में अद्भुत आकर्षण और नेतृत्व की शक्ति आती है।
रसायन विज्ञान: श्लोक ८४ में “रसो रसायनं” शब्द का प्रयोग यह बताता है कि यह रुद्राक्ष आयुर्वेद के क्षेत्र से जुड़े लोगों और वैज्ञानिकों के लिए अत्यंत शुभ है।
पाप निवारण: शास्त्रों के अनुसार, यह रुद्राक्ष अंतर्मन की शुद्धि कर व्यक्ति को अपराध बोध से बाहर निकालता है और उसे आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है।
॥ चतुर्दशमुखी रुद्राक्ष माहात्म्यम् ॥
शुद्ध संस्कृत श्लोक:
चतुर्दशास्यो रुद्राक्षो यदि लभ्येत पुत्रक। धारयेत्स सततं मूर्ध्नि तस्य पिण्डः शिवस्य तु ॥ ८६ ॥
किं मुने बहुनोक्तेन वर्णनेन पुनः पुनः। पूज्यते सततं देवैः प्राप्यते च परा गतिः ॥ ८७ ॥
रुद्राक्ष एकः शिरसा धार्यो भवति वै द्विज। तद्दर्शनं भवेत्पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ८८ ॥ (संदर्भ: शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25)
शुद्ध हिंदी अर्थ एवं व्याख्या:
श्लोक ८६: (भगवान शिव कहते हैं) हे पुत्र! यदि सौभाग्य से चौदह मुख वाला रुद्राक्ष प्राप्त हो जाए, तो उसे निरंतर अपने मस्तक (शिखा) पर धारण करना चाहिए। ऐसा करने वाला मनुष्य साक्षात शिव के शरीर (पिण्ड) के समान हो जाता है। अर्थात, वह शरीर धारी होते हुए भी शिव रूप ही है।
श्लोक ८७: हे मुने! बार-बार विस्तार से वर्णन करने से क्या लाभ? सत्य तो यह है कि जो व्यक्ति इस रुद्राक्ष को धारण करता है, वह देवताओं द्वारा भी पूजा जाता है और अंततः ‘परा गति’ (मोक्ष/कैवल्य) को प्राप्त करता है।
श्लोक ८८: हे द्विज! कम से कम एक रुद्राक्ष तो सिर पर अवश्य धारण करना चाहिए। इसके दर्शन मात्र से महान पुण्य प्राप्त होता है और मनुष्य के समस्त संचित पापों का विनाश हो जाता है।
चौदह मुखी रुद्राक्ष का विशेष महत्व:
परम शिव स्वरूप: इसे स्वयं भगवान शिव का नेत्र माना जाता है। इसे धारण करने वाला व्यक्ति आध्यात्मिक और भौतिक, दोनों दृष्टियों से पूर्ण हो जाता है।
हनुमान जी का आशीर्वाद: इस रुद्राक्ष को भगवान हनुमान का भी स्वरूप माना जाता है, जो साहस, बुद्धि और सुरक्षा प्रदान करता है।
आज्ञा चक्र का जागरण: मस्तक पर धारण करने का विधान इसलिए है क्योंकि यह ‘आज्ञा चक्र’ (Third Eye) को सक्रिय करने में सहायता करता है, जिससे धारक की निर्णय क्षमता और अंतर्ज्ञान (Intuition) अत्यंत तीव्र हो जाता है।
शनि दोष निवारण: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यह रुद्राक्ष शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के दुष्प्रभावों को शांत करने के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
शास्त्रों (शिव पुराण और श्रीमद्देवीभागवत) के अनुसार, प्रत्येक रुद्राक्ष की अपनी शक्ति होती है जिसे जाग्रत करने के लिए विशिष्ट बीज मंत्रों का विधान है। इन मंत्रों के साथ रुद्राक्ष धारण करने पर उसका फल कई गुना बढ़ जाता है।
यहाँ 1 से 14 मुखी रुद्राक्ष (Rudraksha) के शुद्ध शास्त्रीय बीज मंत्रों की सूची दी गई है:
| मुखी | अधिष्ठाता देव | बीज मंत्र (बीजाक्षर) |
| १ मुखी | साक्षात शिव | ॐ ह्रीं नमः |
| २ मुखी | अर्धनारीश्वर | ॐ नमः |
| ३ मुखी | अग्नि देव | ॐ क्लीं नमः |
| ४ मुखी | ब्रह्मा जी | ॐ ह्रीं नमः |
| ५ मुखी | कालाग्नि रुद्र | ॐ ह्रीं नमः |
| ६ मुखी | कार्तिकेय | ॐ ह्रीं हुं नमः |
| ७ मुखी | महालक्ष्मी/अनंत | ॐ हुं नमः |
| ८ मुखी | गणेश जी | ॐ हुं नमः |
| ९ मुखी | माँ दुर्गा/भैरव | ॐ ह्रीं हुं नमः |
| १० मुखी | भगवान विष्णु | ॐ ह्रीं नमः |
| ११ मुखी | एकादश रुद्र | ॐ ह्रीं हुं नमः |
| १२ मुखी | भगवान सूर्य | ॐ क्रौं क्षौं रौं नमः |
| १३ मुखी | कामदेव/इंद्र | ॐ ह्रीं नमः |
| १४ मुखी | परम शिव | ॐ नमः |
धारण करने की शास्त्रीय विधि (संक्षेप में):
- दिन: रुद्राक्ष धारण करने के लिए सोमवार या शिवरात्रि/सावन/प्रदोष का दिन सर्वोत्तम माना गया है।
- शुद्धिकरण: धारण करने से पूर्व रुद्राक्ष को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) से स्नान कराएं।
- अभिमंत्रण: ऊपर दिए गए संबंधित बीज मंत्र का कम से कम 108 बार (एक माला) जप करें।
- प्रतिष्ठा: भगवान शिव के सम्मुख धूप-दीप जलाकर प्रार्थना करें और फिर उसे लाल धागे या सोने-चांदी की चेन में धारण करें।
विशेष निर्देश: रुद्राक्ष (Rudraksha) धारण करने वाले व्यक्ति को सात्विक आहार लेना चाहिए और मदिरा या तामसी भोजन का त्याग करना चाहिए ताकि रुद्राक्ष की दिव्यता बनी रहे।
॥ रुद्राक्ष माहात्म्यम् ॥ शिवपुराण (विद्येश्वर संहिता) और रुद्राक्षजाबालोपनिषद्
१. धारण का अधिकार और विधि
सर्वाश्रमाणां वर्णानां रुद्राक्षाणां च धारणम्। कर्तव्यं मन्त्रतः प्रोक्तं द्विजानां मन्त्रिणां नृप ॥
अर्थ: सभी आश्रमों और वर्णों के मनुष्यों के लिए रुद्राक्ष (Rudraksha) धारण करना अनिवार्य कर्तव्य है। विशेष रूप से द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) को इसे मंत्रोच्चार के साथ ही धारण करना चाहिए।
रुद्राक्षधारणाद्द्रुद्रो भवत्येव न संशयः।
अर्थ: रुद्राक्ष धारण करने से मनुष्य स्वयं रुद्र (शिव) का स्वरूप हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
२. पापों से अभय (रक्षा कवच)
पश्यन्नपि निषिद्धांश्च तथा शृण्वन्नपि स्मरन्। जिघ्रन्नपि तथा चाश्नन्प्रलपन्नपि सन्ततम् ॥
कुर्वन्नपि सदा गच्छन् विसृजन्नपि मानवः। रुद्राक्षधारणादेव सर्वपापैर्न लिप्यते ॥
अर्थ: निषिद्ध वस्तुओं को देखते, सुनते, स्मरण करते, सूंघते, खाते, प्रलाप करते या अन्य शारीरिक क्रियाएँ करते हुए भी यदि मनुष्य ने रुद्राक्ष धारण किया है, तो वह उन दोषों और पापों से लिप्त नहीं होता।
३. भोजन और पेय की दिव्यता
अनेन भुक्तं देवैस्तु भुक्तं भवति तत्त्वतः। पीतं रुद्रेण तत्पीतं घ्रातं घ्रातं शिवेन तत् ॥
अर्थ: रुद्राक्ष धारी जो भोजन करता है, वह वास्तव में देवताओं द्वारा किया गया भोजन है। वह जो जल पीता है, वह साक्षात रुद्र द्वारा पिया गया माना जाता है और जो वह सूंघता है, वह शिव द्वारा सूंघा गया माना जाता है।
४. लज्जा और निंदा का निषेध
रुद्राक्षधारणे लज्जा येषामस्ति महामुने। तेषां नास्ति विनिर्मोक्षः संसाराज्जन्मकोटिभिः ॥
अर्थ: हे महामुने! जिन्हें रुद्राक्ष धारण करने में लज्जा आती है, उनका करोड़ों जन्मों तक इस संसार से उद्धार (मोक्ष) नहीं होता।
रुद्राक्षधारिणं दृष्ट्वा परिवादं करोति यः। उत्पत्तौ तस्य साङ्कर्यमस्त्येवेति विनिश्चयः ॥
अर्थ: रुद्राक्ष धारी को देखकर जो उसकी निंदा या उपहास करता है, वह निश्चित ही संकर (अशुद्ध) योनि का माना जाता है।
५. ब्रह्मा, रुद्र और मुनियों द्वारा स्वीकार्यता
रुद्राक्षधारणादेव रुद्रो रुद्रत्वमाप्नुयात्।
मुनयः सत्यसङ्कल्पा ब्रह्मा ब्रह्मत्वमागतः ॥
अर्थ: रुद्राक्ष धारण करने से ही रुद्र ने रुद्रत्व पाया, मुनि सत्य-संकल्प हुए और ब्रह्मा जी ने ब्रह्मत्व प्राप्त किया।
रुद्राक्षधारणाच्छ्रेष्ठं न किञ्चिदपि विद्यते।
अर्थ: रुद्राक्ष धारण करने से श्रेष्ठ इस संसार में कुछ भी नहीं है।
६. दान, सेवा और चरणामृत की महिमा
रुद्राक्षधारिणे भक्त्या वस्त्रं धान्यं ददाति यः। सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकं सा गच्छति ॥
अर्थ: जो रुद्राक्ष धारी को भक्तिपूर्वक वस्त्र और धान्य देता है, वह सब पापों से मुक्त होकर शिवलोक जाता है।
रुद्राक्षधारिणं विप्रं भोजयेद्यः प्रमदतः। पितृलोकं स लभते नात्र कार्या विचारणा ॥
अर्थ: जो रुद्राक्ष धारी को प्रसन्नतापूर्वक भोजन कराता है, वह अपने पितरों का उद्धार कर उन्हें पितृलोक पहुंचाता है।
रुद्राक्षधारिणः पादौ प्रक्षाल्याद्भिः पिबेन्नरः। सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते ॥
अर्थ: जो मनुष्य रुद्राक्ष धारण किए हुए व्यक्ति के चरणों को धोकर उस जल (चरणामृत) को पीता है, वह शिवलोक में पूजा जाता है।
७. अलंकार और श्रद्धा का फल
हारं वा कटकं वापि सुवर्णं वा द्विजोत्तम। रुद्राक्षसहितं भक्त्या धारयन् रुद्रतामियात् ॥
अर्थ: जो मनुष्य स्वर्ण के हार या कंगन के साथ रुद्राक्ष पिरोकर पहनता है, वह साक्षात रुद्र भाव को प्राप्त होता है।
रुद्राक्षं केवलं वापि यत्र कुत्र महामते। समन्त्रकं वा मन्त्रेण रहितं भाववर्जितम् ॥
यो वा को वा नरो भक्त्या धारयेल्लज्जयापि वा। सर्वपापविनिर्मुक्तः सम्यग्ज्ञानमवाप्नुयात् ॥
अर्थ: केवल रुद्राक्ष को ही, चाहे मंत्र के साथ या बिना मंत्र के, भाव के साथ या बिना भाव के, अथवा लज्जावश ही क्यों न हो—जो मनुष्य धारण करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर पूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है।
उपसंहार
अहो रुद्राक्षमाहात्म्यं मया वक्तुं न शक्यते। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कुर्याद्रुद्राक्षधारणम् ॥
अर्थ: अहो! रुद्राक्ष (Rudraksha) की महिमा का वर्णन मैं (स्वयं महादेव या शास्त्र) भी पूर्णतः नहीं कर सकता। इसलिए हर प्रकार से प्रयत्न करके मनुष्य को रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

॥ रुद्राक्ष की परम शक्तियाँ एवं धारण धारणा ॥ ‘रुद्राक्ष शक्ति चक्र’
| मुखी | स्वरूप/देवता | धारण करने की मुख्य धारणा (शक्ति) | फल एवं विशेष प्रभाव |
| १ | परमतत्व/शिव | ईश्वर प्राप्ति की धारणा | सहज ईश्वर प्राप्ति और मोक्ष का मार्ग। |
| २ | अर्धनारीश्वर | शक्ति-शिव सामंजस्य की धारणा | अर्धनारीश्वर की प्रसन्नता और गृहस्थ सुख। |
| ३ | त्रिअग्नि | अग्नि तृप्ति की धारणा | स्त्री हत्या के पाप से मुक्ति और तेज की वृद्धि। |
| ४ | ब्रह्मा | आरोग्य एवं महाज्ञान की धारणा | नरहत्या पाप नाश, उत्तम स्वास्थ्य और सम्पत्ति। |
| ५ | कालाग्नि रुद्र | शिव संतोष/कल्याण की धारणा | अभक्ष्य-भक्षण और अगम्या-गमन पाप से मुक्ति। |
| ६ | कार्तिकेय/गणेश | बुद्धि एवं विजय की धारणा | ब्रह्महत्या निवारण (बाएं हाथ में धारण श्रेष्ठ)। |
| ७ | सप्तमाता/सूर्य | लक्ष्मी एवं ज्ञान की धारणा | स्वर्ण चोरी पाप मुक्ति, ऐश्वर्य और सप्तऋषि कृपा। |
| ८ | अष्टमाता/गंगा | सत्य एवं शुद्धि की धारणा | गुरुपत्नी गमन जैसे घोर पापों का नाश। |
| ९ | भैरव/यमराज | निर्भयता एवं बल की धारणा | यमराज के भय से मुक्ति, भ्रूणहत्या पाप का प्रायश्चित। |
| १० | विष्णु/दशदिक्पाल | कीर्ति एवं शांति की धारणा | भूत-प्रेत बाधा निवारण और नवग्रह शांति। |
| ११ | एकादश रुद्र/इंद्र | दान-पुण्य पूर्णता की धारणा | सहस्र गोदान का फल (शिखा में धारण)। |
| १२ | महाविष्णु/आदित्य | प्रभुत्व एवं आरोग्य की धारणा | शासन शक्ति (राजपद), शस्त्र और व्याधि से सुरक्षा। |
| १३ | कामदेव | भोग एवं सिद्धि की धारणा | रस-रसायन सिद्धि, समस्त सुखों की प्राप्ति। |
| १४ | रुद्र नेत्र | शिव स्वरूप होना की धारणा | मस्तक पर धारण करने से अनन्त गुण और मान-सम्मान। |
॥ रुद्राक्ष धारण नियमावली एवं माहात्म्य ॥
१. वर्जित आहार (रुद्राक्षधारी के अभक्ष्य)
रुद्राक्ष (Rudraksha) सात्विकता का प्रतीक है, अतः इसे धारण करने वाले को इन वस्तुओं का त्याग करना चाहिए:
- मद्य: मदिरा (शराब) का सेवन पूर्णतः वर्जित है।
- आमिष: मांस, मछली और अंडा।
- तामसिक सब्जियां: लहसुन, प्याज, शिग्रु (सहजन) और श्लेष्मातक (लहसोड़ा)।
- विड्वराह: ग्राम-सूअर का मांस।
नोट: शास्त्रों के अनुसार रुद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति यदि तामसिक भोजन करता है, तो रुद्राक्ष का तेज क्षीण होने लगता है।
२. धारण के अति शुभ मुहूर्त
रुद्राक्ष को ऊर्जावान बनाने और धारण करने के लिए ये समय सर्वश्रेष्ठ हैं:
- ग्रहण: सूर्य या चंद्र ग्रहण का समय।
- संक्रान्ति: विशेषकर मेष संक्रान्ति।
- अयन: उत्तरायण या दक्षिणायन के आरंभ का समय।
- पर्व तिथियाँ: अमावस्या, पूर्णिमा और प्रदोष।
- महाशिवरात्रि एवं श्रावण मास: शिव जी के प्रिय दिन।
३. माला में दानों की संख्या और उनके फल
रुद्राक्ष की माला में मनकों (दानों) की संख्या के अनुसार अलग-अलग फल प्राप्त होते हैं:
| दानों की संख्या | फल/शक्ति |
| १०८ दाने | समस्त कार्यों में सिद्धि और पूर्णता। |
| १०० दाने | मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति। |
| १४० दाने | शारीरिक बल और उत्तम आरोग्य। |
| ३२ दाने | धन-धान्य और ऐश्वर्य की प्राप्ति। |
जप का विधान:
सुमरनी: ५४ या २७ दानों की माला को ‘सुमरनी’ कहा जाता है। ५४ दानों को २ बार और २७ दानों को ४ बार फेरने पर एक पूर्ण माला (१०८) का फल मिलता है।
४. शरीर के अंगों पर धारण संख्या (अंग न्यास)
रुद्राक्ष को शरीर के विभिन्न अंगों पर शास्त्रोक्त संख्या में धारण करने से उस अंग की शक्ति जागृत होती है:
- शिखा (चोटी): १ रुद्राक्ष
- कानों में: ६-६ रुद्राक्ष
- कंठ (गले) में: १०१ या ५० रुद्राक्ष
- बाहों (भुजाओं) में: ११ रुद्राक्ष
- मणिबन्ध (कलाई): ११ रुद्राक्ष
- कटि (कमर): ५ रुद्राक्ष
- यज्ञोपवीत (जनेऊ): १०८ रुद्राक्षों की लड़ी बनाकर धारण करना अत्यंत श्रेष्ठ है।
सारांश संदेश
रुद्राक्ष साक्षात शिव का अश्रु है। इसे नियमपूर्वक धारण करने वाला व्यक्ति संसार के बंधनों में रहते हुए भी उनसे मुक्त रहता है। जो संख्या और विधि बताई गई है, वह शिवपुराण की विद्येश्वर संहिता के निर्देशों के पूर्णतः अनुरूप है।
॥ रुद्राक्ष: औषधीय प्रयोग एवं रोग निवारण ॥
१. रक्तचाप (High Blood Pressure)
- विधि: पंचमुखी या एक मुखी रुद्राक्ष की माला हृदय तक स्पर्श करती हुई पहननी चाहिए।
- प्रभाव: रुद्राक्ष में चुंबकीय गुण होते हैं जो रक्त के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं। यह शरीर की अतिरिक्त ऊष्मा (गर्मी) को सोख लेता है।
- विशेष: रुद्राक्ष भस्म और स्वर्णमाक्षिक भस्म का समान मात्रा (१-१ रत्ती) में सेवन दूध या मलाई के साथ करने से उच्च रक्तचाप में स्थाई लाभ मिलता है।
२. मानसिक रोग एवं स्मरण शक्ति
- विधि: चार मुखी (ब्रह्मा स्वरूप) रुद्राक्ष को दूध में उबालकर वह दूध २० दिनों तक पीना चाहिए।
- लाभ: यह मस्तिष्क के विकारों को दूर करता है। हिस्टीरिया, मूर्च्छा (बेहोशी) और याददाश्त की कमी में यह रामबाण है।
३. स्त्री रोग (हिस्टीरिया एवं प्रदर)
- विधि: स्त्रियों से संबंधित रोगों के लिए छह मुखी (कार्तिकेय स्वरूप) रुद्राक्ष धारण करना अत्यंत लाभकारी है।
- प्रभाव: यह हार्मोनल असंतुलन को ठीक करने और मानसिक अवसाद को दूर करने में सहायक है।
४. श्वास एवं पुरानी खांसी
- विधि: दस मुखी रुद्राक्ष को दूध के साथ घिसकर उसका लेप/पेस्ट दिन में तीन बार रोगी को चटाना चाहिए।
- लाभ: यह फेफड़ों की शक्ति बढ़ाता है और पुरानी से पुरानी खांसी को जड़ से समाप्त करता है।
५. अपस्मार (मिर्गी) एवं मसूरिका (Chekenpox/Smallpox)
- मसूरिका: रुद्राक्ष और काली मिर्च को बराबर मात्रा में लेकर बासी पानी के साथ सेवन करने से लाभ होता है।
- अपस्मार: रुद्राक्ष के गूदे (Internal pulp) का विधिवत सेवन मिर्गी के दौरों को नियंत्रित करता है।
६. दुर्लभ ‘आंवलासार’ रुद्राक्ष: एक रहस्यमयी औषधि
जैसा कि आपने वर्णन किया, आंवलासार रुद्राक्ष (जो गोलाकार, सपाट और बिना धारियों का होता है) अत्यंत दुर्लभ है।
- क्षेत्र: यह उत्तरकाशी के उत्तर-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है।
- शक्ति: इसे ‘सर्व रोग निवारक’ कहा गया है।
- कैंसर एवं क्षय रोग (T.B.): यह रुद्राक्ष कैंसर जैसी असाध्य बीमारियों में भी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाने में सहायक माना जाता है। चर्म रोगों में इसे पानी में घिसकर लगाने से लाभ मिलता है।
रुद्राक्ष भस्म बनाने की विधि (सावधानी):
शास्त्रों में रुद्राक्ष को जलाकर उसकी भस्म बनाने का विधान है, जिसे विभिन्न अनुपानों (शहद, दूध, घी) के साथ लिया जाता है।
विशेष टिप: रुद्राक्ष का पानी (रुद्राक्ष को रात भर तांबे या कांच के बर्तन में भिगोकर सुबह वह पानी पीना) भी पेट के रोगों और रक्त की अशुद्धि के लिए श्रेष्ठ औषधि है।
॥ रुद्राक्ष परीक्षा एवं शुद्धिकरण विधि ॥
१. रुद्राक्ष की प्रामाणिकता की जाँच (असली-नकली)
जल परीक्षण (Water Test): विधि: रुद्राक्ष को पानी के पात्र में डालें। परिणाम: यदि वह डूब जाता है, तो वह उत्तम और पूर्ण परिपक्व (भारी) दाना है। जो तैरता है, वह या तो कच्चा है, कीड़ों द्वारा खाया गया है या लकड़ी का बना नकली दाना हो सकता है।
ताम्र परीक्षण (Copper Test): विधि: रुद्राक्ष को दो तांबे के सिक्कों या भारी पात्रों के बीच रखें। परिणाम: असली रुद्राक्ष अपनी विद्युत-चुंबकीय शक्ति (Electromagnetic power) के कारण एक झटके के साथ दिशा बदल लेता है या हिलने लगता है।
सूक्ष्म निरीक्षण: कीड़े द्वारा खाए हुए, टूटे हुए (खण्डित) या छेद करते समय फटे हुए रुद्राक्ष प्रभावहीन होते हैं। इन्हें धारण नहीं करना चाहिए।
२. धारण से पूर्व शुद्धिकरण (तैलाभिषेक)
रुद्राक्ष को सक्रिय करने और उसे फटने से बचाने के लिए आपने जो तेल की विधि बताई है, वह बहुत महत्वपूर्ण है:
- तैल स्नान: नए रुद्राक्ष को लगभग एक सप्ताह तक शुद्ध सरसों के तेल में डुबोकर रखें।
- रंग परिवर्तन: तेल सोखने के बाद रुद्राक्ष का रंग गहरा और आकर्षक हो जाएगा, जो उसकी परिपक्वता को दर्शाता है।
- स्वच्छता: तेल से निकालकर उसे रुई या साफ कागज से पोंछ लें।
- गंगाजल स्नान: अंत में उसे गंगाजल या शुद्ध जल से धोकर, शिव प्रतिमा से स्पर्श कराकर और बीज मंत्र का जप करते हुए धारण करें।
३. रुद्राक्ष के दोष (इन्हें कभी धारण न करें)
- जो कीड़ों द्वारा खाया गया हो।
- जो बीच से फटा हुआ या खंडित हो।
- जिसमें छिद्र (छेद) करते समय दरारें आ गई हों।
॥ रुद्राक्ष क्रय सावधानी एवं सिद्धि काल ॥
१. मूल्य का निर्धारण (आकार और मुख)
- आकार का प्रभाव: रुद्राक्ष का मूल्य उसके आकार पर निर्भर करता है। मध्यम आकार के दाने सबसे सस्ते होते हैं, जबकि दाना जितना छोटा (काली मिर्च के समान) होता जाएगा, उसका मूल्य उतना ही बढ़ता जाएगा।
- इसी प्रकार बहुत बड़े (आंवले के समान) दानों का मूल्य भी अधिक होता है।
- मुखों का प्रभाव: ५-मुखी रुद्राक्ष सबसे सुलभ और सस्ता है। इससे अधिक मुख (६-१४) या कम मुख (१-४) होने पर दुर्लभता के कारण मूल्य बढ़ता जाता है।
२. नकली रुद्राक्ष से बचाव (धोखाधड़ी के प्रकार)
- कृत्रिम धारियां: बेईमान व्यापारी कम मुख वाले दानों पर धारियां बनाकर उन्हें ७ या ८ मुखी बताकर बेचते हैं।
- एक-मुखी का छल: असली गोल एक-मुखी अत्यंत दुर्लभ (अप्राप्य) है। व्यापारी अक्सर बेर की गुठली या लकड़ी पर नक्काशी करके इसे नेपाल के नाम पर भारी कीमतों (हजारों-लाखों) में बेचते हैं।
- पहचान: बेर की गुठली पर प्राकृतिक धारियां और पृष्ठ पर ‘मुद्रा’ (प्राकृतिक उभार) नहीं होते।
३. धारण विधि और फल की अवधि
- धागे का प्रयोग करें।
- फल प्राप्ति काल: श्रद्धा और विश्वास के साथ धारण करने पर ४० दिनों के भीतर अभीष्ट कार्य में लाभ दिखना प्रारंभ हो जाता है।
- अकाल मृत्यु से रक्षा: यह अनुभूत सत्य है कि रुद्राक्ष धारी की अकाल मृत्यु नहीं होती।
४. एक व्यापक भ्रम का निवारण
- गृहस्थ vs साधु: यह सोचना गलत है कि इसे केवल साधु-संत ही पहन सकते हैं।
- संन्यासी: इसे धर्म और मोक्ष के लिए पहनते हैं।
- गृहस्थ: इसे धर्म की मर्यादा में रहकर अर्थ (धन) और काम (सुख) के उपभोग के साथ-साथ अंत में मोक्ष प्राप्त करने के लिए पहनते हैं।
निष्कर्ष: रुद्राक्ष (Rudraksha) शिव का वरदान है। यह भौतिक दुखों से तप्त मनुष्यों के लिए शीतलता और शक्ति का स्रोत है। इसे मात्र एक लकड़ी का दाना न समझकर, साक्षात महादेव का अंश मानकर धारण करना चाहिए।
महादेव की कृपा आप पर बनी रहे।
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1 Mukhi Rudraksha (Indonesia – Java) | Certified & Energized | Shiva Swaroop | Rare Ek Mukhi नेचुरल 1 मुखी रुद्राक्ष (इंडोनेशिया – जावा) | प्रमाणित व अभिमंत्रित | शिव स्वरूप | दुर्लभ एक मुखी
Price range: ₹1,999.00 through ₹22,999.001 Mukhi Savaar Rudraksha (Nepali) | One Mukhi Rudraksha | Lord Shiva Swaroop | Sun Power | Lab Certified | Energized एक मुखी सवार रुद्राक्ष (नेपाली) | वन मुखी रुद्राक्ष | भगवान शिव स्वरूप | सूर्य तत्व | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹33,999.00 through ₹44,999.0010 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Ten Faced Rudraksha | Lord Vishnu Beej | Lab Certified | Energized 10 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | दस मुखी रुद्राक्ष | भगवान विष्णु बीज | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹4,999.00 through ₹10,299.0011 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Eleven Faced Rudraksha | Lord Hanuman Beej | Lab Certified | Energized 11 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | ग्यारह मुखी रुद्राक्ष | भगवान हनुमान बीज | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹4,999.00 through ₹14,499.0012 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Twelve Faced Rudraksha | Lord Surya Beej | Lab Certified | Energized 12 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | बारह मुखी रुद्राक्ष | भगवान सूर्य बीज | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹5,999.00 through ₹15,499.0013 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Thirteen Faced Rudraksha | Lord Indra & Kamadeva Beej | Lab Certified | Energized 13 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | तेरह मुखी रुद्राक्ष | इन्द्र एवं कामदेव स्वरूप | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹7,999.00 through ₹20,499.0014 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Dev Mani Rudraksha | Lord Hanuman & Shiva Beej | Lab Certified | Energized 14 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | देव मणि रुद्राक्ष | हनुमान व शिव स्वरूप | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹34,999.00 through ₹94,999.0015 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Fifteen Faced Rudraksha | Lord Pashupatinath (Shiva) Beej | Lab Certified | Energized 15 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | पंद्रह मुखी रुद्राक्ष | भगवान पशुपतिनाथ (शिव) स्वरूप | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹31,999.00 through ₹94,999.0016 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Sixteen Mukhi Rudraksha | Lord Rama Beej | Rahu Shanti | Lab Certified | Energized 16 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | सोलह मुखी रुद्राक्ष | भगवान श्रीराम स्वरूप | राहु शांति | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹69,999.00 through ₹129,999.0017 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Seventeen Mukhi Rudraksha | Lord Vishwakarma Beej | Saturn Shanti | Lab Certified | Energized 17 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | सत्रह मुखी रुद्राक्ष | भगवान विश्वकर्मा स्वरूप | शनि शांति | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹221,000.00 through ₹370,000.0018 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Eighteen Mukhi Rudraksha | Bhumi Devi Beej | Mars Shanti | Lab Certified | Energized 18 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | अठारह मुखी रुद्राक्ष | भूमि देवी स्वरूप | मंगल शांति | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹360,000.00 through ₹520,000.0019 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Nineteen Mukhi Rudraksha | Lord Vishnu Beej | Sun Shanti | Lab Certified | Energized 19 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | उन्नीस मुखी रुद्राक्ष | भगवान विष्णु स्वरूप | सूर्य शांति | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹950,000.00 through ₹1,150,000.0020 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Twenty Mukhi Rudraksha | Param Brahm Swaroop | Moon Shanti | Lab Certified | Energized 20 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | बीस मुखी रुद्राक्ष | परम ब्रह्म स्वरूप | चंद्र शांति | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹1,200,000.00 through ₹1,650,000.0021 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Twenty-One Mukhi Rudraksha | Lord Kubera Beej | Venus Shanti | Lab Certified | Energized 21 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | इक्कीस मुखी रुद्राक्ष | भगवान कुबेर स्वरूप | शुक्र शांति | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹6,000,000.00 through ₹8,500,000.006 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Six Faced Rudraksha | Lord Kartikeya Beej | Lab Certified | Energized 6 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | छह मुखी रुद्राक्ष | भगवान कार्तिकेय बीज | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹199.00 through ₹1,199.007 Chakra Lava Stone Bracelet – सात चक्र लावा स्टोन ब्रेसलेट | Natural, Energized, Premium Quality
Original price was: ₹999.00.₹499.00Current price is: ₹499.00.7 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Seven Faced Rudraksha | Goddess Mahalakshmi Beej | Lab Certified | Energized 7 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | सात मुखी रुद्राक्ष | देवी महालक्ष्मी बीज | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹750.00 through ₹2,299.008 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Eight Faced Rudraksha | Lord Ganesha Beej | Lab Certified | Energized 8 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | आठ मुखी रुद्राक्ष | भगवान गणेश बीज | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹3,499.00 through ₹9,299.009 Mukhi Rudraksha (Nepali) | Nine Faced Rudraksha | Goddess Durga Beej | Lab Certified | Energized 9 मुखी रुद्राक्ष (नेपाली) | नौ मुखी रुद्राक्ष | देवी दुर्गा बीज | लैब सर्टिफाइड | अभिमंत्रित
Price range: ₹4,499.00 through ₹10,299.00AAA Quality Iran Firoza (Turquoise) Silver Bracelet, Lab Certified & Energized | ईरानी फिरोज़ा चांदी ब्रेसलेट
Original price was: ₹29,999.00.₹12,999.00Current price is: ₹12,999.00.Anantmool Ki Jad – Mangal Graha Jad | Mars Planet Remedy
Price range: ₹499.00 through ₹2,599.00Apamarga Chichiri Root – Budh Graha Jad | Mercury Planet Remedy
Price range: ₹499.00 through ₹2,599.00Aparajita Shankhpushpi Root – Guru Budh Graha Jad | Jupiter Remedy
Price range: ₹499.00 through ₹2,599.00Arandi Arandmool Ki Jad – Shukra Graha Jad | Venus Remedy
Price range: ₹499.00 through ₹2,599.00Ashwagandha Root – Ketu Graha Jad | Ketu Planet Remedy
Price range: ₹499.00 through ₹2,599.00Baglamukhi Puja, Jaap and Yagna
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Price range: ₹499.00 through ₹2,599.00Bharangi Sarpagandha Ki Jad – Guru Graha Jad | Jupiter Remedy
Price range: ₹499.00 through ₹2,599.00Bicchua Ki Jad – Shani Graha Jad | Saturn Planet Remedy
Price range: ₹499.00 through ₹2,599.00Cat’s Eye Stone (Lehsunia / Vaidurya) – Ketu Graha Ratna
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One comment
Divya
After reading the genuine information in that blog, I felt a quiet sense of clarity—as if confusion gently stepped aside and something deeply truthful touched my mind. It wasn’t just knowledge, it felt like discovering a small piece of inner peace I didn’t know I was searching for but I got ocean of knowledge about our ancient spirituality.
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